मुल्तानी_मिट्टी{मेट) Multani Mitti

मुल्तानी_मिट्टी{मेट) Multani Mitti

लोकगीतों में भी इसके महत्व का वरणाव मिलता है... जब किसी नवयौवना का विवाह तय हो जाता था तो उसके सर में चमेली का सुगंधित तेल लगाने से पूर्व उसका माथा मेट से धोने का स्थानीय लोकगीतों में वर्णन है...थार की महिलाओं साबुन के अभाव में स्थानीय मुल्तानी मिट्टी से ही अपना सर प्रक्षालन करती थी... इस मेट के बहुत से किस्से है। बचपन में जब हम छोटे थे,और जब कभी लू लगती थी तो मां इस मुल्तानी मिट्टी का संपूर्ण शरीर पर लेपन करती थी तथा हमारे तन और केशों का प्रक्षालन भी बहुधा इस मेट से ही होता था।

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मिश्री- रोटी

मिश्री- रोटी

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बिन पाणी रूप ऊजळी, दाग नी होवे हैक। साकर ज्यों मीठी, चुतराई रो पुड़ पाको हैक।। अर्थात् राणोसा ऐसी रोटी का जीमण करेंगे जो बिना पानी के, बिना दाग के हो तथा उसका रंग ऊजळा(सफेद) तथा स्वाद में मीठी होनी चाहिये तथा ऐसी चुतराई(स्वच्छता व कौशल) से बनी हो की रोटी को एक (पुड़) तरफ ही पकाया जाये। इस तरह की रोटी के बारे में सुनकर ठाकुर साहब को लगा की घर आये मेहमानों को भूखा जाना होगा फिर भी उन्होने ठकुराइन को इस बारे में अवगत करवाया। ठकुराइन ने कहा आप निश्चित रहे मैं ऐसी ही रोटी बनाकर राणा जी को खिलाऊंगी एवं ठकुराइन ने अपनी देवराणी के सहयोग से घृत(घी) व मैदे से कंगूरे बनाकर एक तरफ पकाकर पीसी मिश्री के मेल से वैसी ही कल्पित रोटी को साकार कर दिखाया।

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हाबूर का पत्थर

हाबूर का पत्थर

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जैसलमेर शहर के उत्तर पश्चिम में 40 किलो मीटर की दूरी पर स्थित हाबुर नाम के गांव में पाया जाने वाला जीवाश्म पत्थर ही हाबूर का पत्थर है भूगर्भशास्त्री इस पत्थर की रचना 12 करोड़ साल से लेकर 10 करोड़ साल पहले होना बताते इस पुत्पर का रंग गहरे भूरे या कॉफी के रंग जैसा होता है इस पत्थर के अन्दर जो आकृतियाँ है वह समुन्द्री सेवाल और छोटे समुन्द्री जीवों के जिवाश्म ही हैं पश्चिमी राजस्थान में हाकडो नाम से जिसे टेथिस सागर भी कहते हैं एक समुन्द्र हुआ करता था जिसके सूख जाने से यह पत्थर सतह पर आये है।

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खजूर

खजूर

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पश्चिमी राजस्थान में खजूर, खेती की शुरुआत 2009 में हुई थी और उत्पादन 2013 से आना शुरू हुआ, बाड़मरे के 300 हेक्टेयर में खजूर की बागवानी होती है सालाना उत्पादन करीब 800 टन है जिससे किसानों की आय में इजाफा हुआ है। बारिश कम होने से इस क्षेत्र में मेडजूल, खलास और किमिया प्रजाति की खजूर के पींड पौधे पर ही बन जाते हैं जिनकी बाजार में ज्यादा किमत है और भारत मैं इनका उत्पादन सिर्फ बाड़मेर- जैसलमेर में ही होता है।

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गाय का A2 बिलौना घी

गाय का A2 बिलौना घी

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राजस्थान का पश्चिमी हिस्सा थार मरुस्थल जो अपनी पोष्टिक घास के लिए विश्व प्रसिद्ध है यहाँ उगने वाली सेवण घास को किंग ग्रास भी कहते है उसके साथ उगने वाली भूरट, मुरठ, बेकर, कांटी, धामण, ग्रामणो, मींजल, चंदलो, लम्प, बुर, डाबी, दूधेली, गुंदी, गुग्गल, गंगण, लाई, लंप, बाजर वेल, खड़ काचर आदी घासे इस मरूस्थल को पशुपालकों के लिए बेहतरीन स्थान बनाते है ।

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जीरा और बाड़मेर

जीरा और बाड़मेर

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जीरा मुख्यतः मिश्र, भारत, चीन और भूमध्यसागरीय देशों का पौधा है लेकिन जीरे का 70% उत्पादन भारत में ही होता है और भारत में भी सिर्फ दो राज्यों के कुछ जिलों में ही इसका उत्पादन होता है हजारों सालों से जीरा भोजन का मुख्य घटक रहा है, यह स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभकारी है यह पेट और आँतों व सम्पूर्ण पाचन तंत्र को स्वस्थ रखता है जिससे कब्जी से राहत मिलती है जीरे में मोजुद लोह तत्व शरीर में लौह तत्व की पूर्ति करता है और कैल्शियम की मात्रा होने के कारण यह हमारी हड्डियों को मजबुती देता है एंटीऑक्सिडेंट होने से यह त्वचा को स्वस्थ रखता है और ताज़गी देता है जीरा खाने से शरीर का डिटॉक्सीफिकेशन होता है कैलोरी कम होने के कारण वज़न भी स्थिर रखता है

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रेगिस्तान के जहाज ऊँट की स्थिति और भविष्य

रेगिस्तान के जहाज ऊँट की स्थिति और भविष्य

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भारत के पश्चिम में बसे राजस्थान का जिक्र थार मरुस्थल के बिना अधूरा है और मरुस्थल ऊँट के बिना अधूरा। ऊँट जिसे पहचाना ही रेगिस्तान के जहाज के रुप में जाता है, थार मरुस्थल में जहाज से भी कहीं ज्यादा अनमोल है। विभिन्न सुनहरे रँगों से दमकती राजस्थान की जिस सँस्कृति को आज हम देखते हैं उसकी नींव ऊँटों की पीठ पर ही टिकी हुई है। हजारों वर्ष पहले संस्कृत भाषा ने ऊँट को अनेक पर्यायवाची दिये थे, जिनमें एक नाम "मय" भी है, इसी से "माया" भी निकली। महाभारत में "मय" नाम का राक्षस, पांडवों के लिये इंद्रप्रस्थ का निर्माण करता है, जहाँ "मय" की शक्तियाँ "मायाजाल" का अनुपम उपयोग करती हैं, जिनके भ्रम में अच्छे-अच्छे "मायावी" भी उलझ जाते हैं।

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